मोहब्बत छोड महबूब हुआ था
छोड दिया ख़ुदा तो पीर हुआ था
वो हाकिम नही मगर है दुश्मन
ये दवा खाके ही पता हुआ था
हुबहू आदमी के पैमाने मे
शायद ख़ुदा भी गलत हुआ था
तबसे दिल दुखी नही जो उनकी
मेहरबानी से राख हुआ था
‘सलिक’ गवाह न मिला एक भी वहाँ
शायद कत्ल सरेआम हुआ था

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