राह यह कुछ अजीब है
नाकाम हैं गुजर जाना
दर्द-ए-दस्तक हैं दिल पे
उनका बेखबर जाना
लज्जत हैं कैसी गम में
लाजिम नहीं सँवर जाना
अब जो कोई मंज़िल नहीं
जाना तो किधर जाना
"सलिक" दो राहें शाद की
ना जाना, ठहर जाना
तू नज्म है या शायरी या फिर गीत ही कोई मेरे किताब का पन्ना या उडती पतंग है कोई -सलिक .
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