by 8:43 PM 0 comments
राह यह कुछ अजीब है 
नाकाम हैं गुजर जाना

दर्द-ए-दस्तक हैं दिल पे 
उनका बेखबर जाना

लज्जत हैं कैसी गम में
लाजिम नहीं सँवर जाना

अब जो कोई मंज़िल नहीं 
जाना तो किधर जाना

"सलिक" दो राहें शाद की
ना जाना, ठहर जाना

नितीन कळंबे

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तू नज्म है या शायरी या फिर गीत ही कोई मेरे किताब का पन्ना या उडती पतंग है कोई -सलिक .

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