by 8:44 PM 0 comments
फरियाद है इस ज़िन्दगी से 
तब तक जब तक जिन्दा हूँ
ना किस गुल से इश्क़ क़र सका 
हरजाई परिंदा हूँ

तूफान उठा था भीतर भी 
जो कभी किसीको दिख़ा नहीं 
ख़्वाब बहे अरमान बिखेरें 
जीने लायक रखा नहीं

नजर उठा के देखूँ तुझको
ऐसा आलम रहा नहीं 
पाया होगा तेरा आँचल 
फिर भी तू अब जहाँ नहीं

सुन रहा हूँ शून्य की धून
लफ्ज़ो में जो बयां नहीं
जैसे चाहे सुना फ़साना 
जानता हूँ नया नहीं

ज़िन्दगी तू वही ठहर 
मैं जीने लायक बचा नहीं 
तुझसे मेरा ख़त्म सिलसिला 
उम्रभर भी रहा नहीं

नितीन कळंबे

Developer

तू नज्म है या शायरी या फिर गीत ही कोई मेरे किताब का पन्ना या उडती पतंग है कोई -सलिक .

0 comments:

Post a Comment