by 8:33 PM 1 comments
दबी धड़कन को जबान देना चाहता हूँ 
किसी शाम तेरा नाम लेना चाहता हूँ

तू मुंसिफ़ होकर भी साबित ना कर पायी 
वो बेदिली का इल्ज़ाम लेना चाहता हूँ

क्या कमी थी मेरे अंदाज-ए-मोहब्बत में 
दुश्मन से यही पैगाम लेना चाहता हूँ

और एक आख़री ख़्वाइश है ख़ुदा-ए-ज़ब्त
इन हाथो में अंजाम लेना चाहता हूँ

नितीन कळंबे

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तू नज्म है या शायरी या फिर गीत ही कोई मेरे किताब का पन्ना या उडती पतंग है कोई -सलिक .

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