दबी धड़कन को जबान देना चाहता हूँ
किसी शाम तेरा नाम लेना चाहता हूँ
तू मुंसिफ़ होकर भी साबित ना कर पायी
वो बेदिली का इल्ज़ाम लेना चाहता हूँ
क्या कमी थी मेरे अंदाज-ए-मोहब्बत में
दुश्मन से यही पैगाम लेना चाहता हूँ
और एक आख़री ख़्वाइश है ख़ुदा-ए-ज़ब्त
इन हाथो में अंजाम लेना चाहता हूँ

खूप छान गजल...
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