फरियाद है इस ज़िन्दगी से 
तब तक जब तक जिन्दा हूँ
ना किस गुल से इश्क़ क़र सका 
हरजाई परिंदा हूँ

तूफान उठा था भीतर भी 
जो कभी किसीको दिख़ा नहीं 
ख़्वाब बहे अरमान बिखेरें 
जीने लायक रखा नहीं

नजर उठा के देखूँ तुझको
ऐसा आलम रहा नहीं 
पाया होगा तेरा आँचल 
फिर भी तू अब जहाँ नहीं

सुन रहा हूँ शून्य की धून
लफ्ज़ो में जो बयां नहीं
जैसे चाहे सुना फ़साना 
जानता हूँ नया नहीं

ज़िन्दगी तू वही ठहर 
मैं जीने लायक बचा नहीं 
तुझसे मेरा ख़त्म सिलसिला 
उम्रभर भी रहा नहीं
राह यह कुछ अजीब है 
नाकाम हैं गुजर जाना

दर्द-ए-दस्तक हैं दिल पे 
उनका बेखबर जाना

लज्जत हैं कैसी गम में
लाजिम नहीं सँवर जाना

अब जो कोई मंज़िल नहीं 
जाना तो किधर जाना

"सलिक" दो राहें शाद की
ना जाना, ठहर जाना
तेरी कोशिश कामयाब कर गयी 
तेरी हर ख़्वाइश नवाब कर गयी

वैसे नरम तबियत थे हम लेकिन 
तेरी बेचैनी इज़्तिराब कर गयी

अजल से था ' सलिक ' तकलीफ में दिल
वो उस सवाल को जवाब कर गयी

ख्वाब गिनके रखे थे कुछ बोरी में 
तेरी निगाह बेहिसाब कर गयी

उलझा दिल सोचता रहा के कौन 
जो ये रात आफ़ताब कर गयी

मालूम होते थे नरम मिज़ाज हम 
किसकी आहट बे-नक़ाब कर गयी
कुछ कशिश सी दरमियान हो जाए
तेरी मेरी दास्तान हो जाए

बहुत होंगे तेरे आशिक लेकिन 
हमारा भी इम्तिहान हो जाए

इस तरह मिल के नींद ना टूटे
और हक़ीकत अरमान हो जाए

तेरे नूरसे आफ़ताब छिप जाए
तू चाँद हम आसमान हो जाए

दिल रक्खा हैं निशाने पे हमने 
जो तू तीर-ओ-कमान हो जाए
पर्दानशीं है लुभाता रहेगा 
मेरे सब्र को आजमाता रहेगा

यहाँ हर जगह हैं दिमागी सियासत 
क्या दिल दूसरे को सताता रहेगा

ज़ेहानत से तेरी मैं हैराँ हुआ हु
कोई ख़्वाब कब तक सजाता रहेगा

भटक जायेगा वो यक़ीनन मुसाफिर 
जो राहों से नाता बनाता रहेगा

सुनो बादलों में फसां है परिंदा
तुम्हे याद मेरी दिलाता रहेगा

टुटा हुआ दिल तेरी बेवफाई 
तेरी बज्म में ही सुनाता रहेगा
पर्दानशीं है लुभाता रहेगा 
मेरे सब्र को आजमाता रहेगा

यहाँ हर जगह हैं दिमागी सियासत 
क्या दिल दूसरे को सताता रहेगा

ज़ेहानत से तेरी मैं हैराँ हुआ हु
कोई ख़्वाब कब तक सजाता रहेगा

भटक जायेगा वो यक़ीनन मुसाफिर 
जो राहों से नाता बनाता रहेगा

सुनो बादलों में फसां है परिंदा
तुम्हे याद मेरी दिलाता रहेगा

टुटा हुआ दिल तेरी बेवफाई 
तेरी बज्म में ही सुनाता रहेगा
मोहब्बत छोड महबूब हुआ था 
छोड दिया ख़ुदा तो पीर हुआ था

वो हाकिम नही मगर है दुश्मन
ये दवा खाके ही पता हुआ था

हुबहू आदमी के पैमाने मे
शायद ख़ुदा भी गलत हुआ था

तबसे दिल दुखी नही जो उनकी 
मेहरबानी से राख हुआ था

‘सलिक’ गवाह न मिला एक भी वहाँ 
शायद कत्ल सरेआम हुआ था