फरियाद है इस ज़िन्दगी से
तब तक जब तक जिन्दा हूँ
ना किस गुल से इश्क़ क़र सका
हरजाई परिंदा हूँ
तूफान उठा था भीतर भी
जो कभी किसीको दिख़ा नहीं
ख़्वाब बहे अरमान बिखेरें
जीने लायक रखा नहीं
नजर उठा के देखूँ तुझको
ऐसा आलम रहा नहीं
पाया होगा तेरा आँचल
फिर भी तू अब जहाँ नहीं
सुन रहा हूँ शून्य की धून
लफ्ज़ो में जो बयां नहीं
जैसे चाहे सुना फ़साना
जानता हूँ नया नहीं
ज़िन्दगी तू वही ठहर
मैं जीने लायक बचा नहीं
तुझसे मेरा ख़त्म सिलसिला
उम्रभर भी रहा नहीं