by 8:38 PM 0 comments
पर्दानशीं है लुभाता रहेगा 
मेरे सब्र को आजमाता रहेगा

यहाँ हर जगह हैं दिमागी सियासत 
क्या दिल दूसरे को सताता रहेगा

ज़ेहानत से तेरी मैं हैराँ हुआ हु
कोई ख़्वाब कब तक सजाता रहेगा

भटक जायेगा वो यक़ीनन मुसाफिर 
जो राहों से नाता बनाता रहेगा

सुनो बादलों में फसां है परिंदा
तुम्हे याद मेरी दिलाता रहेगा

टुटा हुआ दिल तेरी बेवफाई 
तेरी बज्म में ही सुनाता रहेगा

नितीन कळंबे

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तू नज्म है या शायरी या फिर गीत ही कोई मेरे किताब का पन्ना या उडती पतंग है कोई -सलिक .

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