by 8:41 PM 0 comments
तेरी कोशिश कामयाब कर गयी 
तेरी हर ख़्वाइश नवाब कर गयी

वैसे नरम तबियत थे हम लेकिन 
तेरी बेचैनी इज़्तिराब कर गयी

अजल से था ' सलिक ' तकलीफ में दिल
वो उस सवाल को जवाब कर गयी

ख्वाब गिनके रखे थे कुछ बोरी में 
तेरी निगाह बेहिसाब कर गयी

उलझा दिल सोचता रहा के कौन 
जो ये रात आफ़ताब कर गयी

मालूम होते थे नरम मिज़ाज हम 
किसकी आहट बे-नक़ाब कर गयी

नितीन कळंबे

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तू नज्म है या शायरी या फिर गीत ही कोई मेरे किताब का पन्ना या उडती पतंग है कोई -सलिक .

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