by 8:35 PM 0 comments
अब्र बिगड़े हैं आसमाँ झुलाए जा रहे हैं
हो रही हैं शाम और हम खोएं जा रहे हैं

कह दो उनसे के संभाले अपनी निगाहें 
उजड़े मकान अभी-अभी बसाए जा रहे हैं

क्या गुनाह किया जो कैद हूँ यादों के साथ 
आजाद मेरे क़ातिल सताए जा रहे हैं

उनकी राह पे खड़ा हैं दिल जिस्म रोके हुए 
कशिश से हारे साए बेवफा हुए जा रहे हैं

'सलिक' तेरे शहर की बात ही कुछ और हैं 
अपने आ रहे हैं और पराए जा रहे हैं

नितीन कळंबे

Developer

तू नज्म है या शायरी या फिर गीत ही कोई मेरे किताब का पन्ना या उडती पतंग है कोई -सलिक .

0 comments:

Post a Comment