अब्र बिगड़े हैं आसमाँ झुलाए जा रहे हैं
हो रही हैं शाम और हम खोएं जा रहे हैं
कह दो उनसे के संभाले अपनी निगाहें
उजड़े मकान अभी-अभी बसाए जा रहे हैं
क्या गुनाह किया जो कैद हूँ यादों के साथ
आजाद मेरे क़ातिल सताए जा रहे हैं
उनकी राह पे खड़ा हैं दिल जिस्म रोके हुए
कशिश से हारे साए बेवफा हुए जा रहे हैं
'सलिक' तेरे शहर की बात ही कुछ और हैं
अपने आ रहे हैं और पराए जा रहे हैं

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