by 8:37 PM 0 comments
उन्हीं जुल्फों से आयी है ऐ ख़ुदा ये काफ़िरी 
वो सँवरते चले गए हम बिगड़ते चले गए

मुज़रिम चाहें लोग कहे ख़ुदा देखेगा नीयत 
उन्हें पाते चले गए गुनाह करते चले गए

हमारी तक़दीर है तारों की तरह 'सलिक'
वो चाहते चले गए हम टूटते चले गए

नितीन कळंबे

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तू नज्म है या शायरी या फिर गीत ही कोई मेरे किताब का पन्ना या उडती पतंग है कोई -सलिक .

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